आवारा कुत्तों के खौफ साए में बचपन जीने को मजबूर बच्चे
NEWS DESK: कुत्ता और मानव के बीच संबंध काफी गहरा है। कुत्ता को सबसे वफादार पशु माना जाता है। कुत्ते की वफादारी के कई किस्से कहे और सुने जाते हैं। मानव के द्वारा हजारों साल पहले सबसे पहले कुत्ता को ही पालतू पशु बनाया गया। तब से लेकर आज तक कुत्ता को पालतू पशु के रूप में जाना जाता है। कुछ कुत्ते किसी के द्वारा पाले नहीं गए होते हैं इन्हें गली का कुत्ता कहा जाता है। गली के कुत्ते अपने भोजन के लिए मोहल्ले के लोगों के द्वारा छोड़े गए जूठन पर आश्रित रहते हैं। इन आवारा कुत्तों की गतिविधि दिन में निष्क्रिय रहती है। इनका खौफ रात में देखने को मिलता है। आवारा कुत्ते झुंड में होने पर काफी आक्रामक हो जाते हैं
झुंड के आवारा कुत्तों का सामना करना बड़े उम्र के लोगों के लिए भी सिहरन भरा हो जाता है। ऐसे में कोई बच्चा अगर इन आवारा कुत्तों के पाले में पड़ जाए तो उन्हें अपनी जान तक गंवानी पड़ती है। इन आवारा कुत्तों के शिकार लोगों के लिए रवि जैसी खतरनाक बीमारी से बचने के लिए टीका लगवाना पड़ता है वही मासूम बच्चों को आवारा कुत्तों के झुंड द्वारा नच-नोज कर लहू लुहान कर दिया जाता है। इन दोनों बिहार के समस्तीपुर जिला में आवारा कुत्तों ने आतंक मचा रखा है
आवारा कुत्तों का खौफ इस कदर है कि लोग अपने बच्चों को अकेला छोड़ना नहीं चाह रहे हैं। आवारा कुत्तों के खौफ के साए में बचपन जीने को बच्चे मजबूर है। आवारा कुत्तों के झुंड का शिकार कम उम्र के बच्चे हो रहे हैं जिला के विभूतिपुर में आवारा कुत्तों के द्वारा स्कूल जा रहे दो भाइयों को बुरी तरह नोच नोच कर जख्मी कर दिया जिसमें दोनों बच्चे को जान गंवानी पड़ी।वही कई बच्चों को अस्पताल में इलाज की नौबत आ जाती है। अभी हाल ही में हसनपुर में एक 13 वर्षीय लड़के की कुत्तों ने नोच नोच कर लहूलुहान कर दिया जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। आवारा कुत्तों के ख़ौफ़ से निजात दिलाने की मांग की जा रही है। शहरों में नगर प्रशासन के द्वारा आवारा कुत्तों का रेस्क्यू कर नसबंदी कर दिया जाता है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में आवारा कुत्तों की मौज है। पंचायती राज के नुमाइंदों को अपनी जनता को आवारा कुत्तों के खौफ से बचानेकी फिक्र नहीं है।वहीं आवारा कुत्तों के आतंक को समाप्त करना प्रशासन का काम है जिसकी और लोग टकटकी लगाए हैं। देश का कानून आवारा कुत्तों को मनमानी ढंग से हटाने पर रोक लगाता है। पशु नियंत्रण विभाग इसके लिए काम करती है। पशु क्रूरता निवारण अधिनियम आवारा कुत्तों को संरक्षण प्रदान करता है। आवारा कुत्तों को मारना, जहर देना या उसे अपाहिज करने पर कानून में 5 साल तक के कैद की सजा का प्रावधान है। ऐसे में सवाल उठता है कि आवारा कुत्तों के हिंसक हमले में मारे गए बच्चों के मौत का जिम्मेदार किसे माना जाए। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग आवारा कुत्तों से मौत के मामले में राज्य सरकार को जिम्मेवार मानती है तथा पीड़ित व्यक्ति को मुआवजा देने का निर्देश देती है। वही हाई कोर्ट ने भी अपने निर्णय में राज्य सरकारों को आवारा कुत्तों से हुई मौत के मामले में मुआवजा देने का निर्देश दिया है।