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सुविधा विहीन गैर मान्यता मदरसों में पढ़ रहे छात्र बेहाल, संचालक हो रहे मालामाल।

NEWS DESK: बिहार में मदरसा में दीनी तालीम दी जाती है। इन मदरसों में उर्दू, अरबी भाषा में धार्मिक शिक्षा प्रदान की जाती है। वर्तमान समय में मदरसों में हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान की भी शिक्षा दी जाने लगी है। मदरसा को नियंत्रित करने के लिए बिहार राज्य मदरसा शिक्षा बोर्ड काम कर रही है। मदरसा को बोर्ड के मानकों के अनुरूप संचालन करना होता है। कई मानकों पर खरा उतरने के बाद बोर्ड मान्यता प्रदान करती है। बिहार में मान्यता प्राप्त मदरसों को अल्पसंख्यक कल्याण विभाग कई आवश्यक सुविधाएं प्रदान करती है। वहीं राज्य में कई गैर मान्यता प्राप्त मदरसे संचालित हो रहे हैं। इन गैर मान्यता प्राप्त मदरसों में मानकों का धड़ल्ले से उल्लंघन हो रहा है। किराए के मकान में चलने वाले गैर मान्यता प्राप्त मदरसों में बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव रहता है। गैर मान्यता प्राप्त मदरसों के द्वारा जमकर चंदा वसूली की जाती है, जिसका कोई लेखा जोखा नहीं होता है। गैर मान्यता प्राप्त मदरसों के फंडिंग का पैसा कहां इस्तेमाल होता है, इसको भी कोई देखने वाला नहीं है। चंदा उगाही तथा फंडिंग से मदरसे के संचालक मालामाल हो रहे हैंवहीं वहां पढ़ने वाले छात्र छात्राएं बेहाल हैं। सूबे के समस्तीपुर जिले के सिंघिया प्रखण्ड में गैर मान्यता प्राप्त मदरसा सालेपुर, सिवैया, बलहा गांव में संचालित किया जा रहा है इन मदरसों में सरकारी कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही है। स्थानीय मोहम्मद ऊबैश बताते हैं कि मदरसा दारुल हुदा अल्बनत में पढ़ाने वाले शिक्षक तथा कमरों का अभाव है। लेकिन लोगों से चंदा उगाही में कोई कोर कसर नहीं है। ग्रामीण पप्पु का कहना है कि सालेपुर निवासी मुफ्ती सईद कई गैर मान्यता प्राप्त मदरसा संचालित कर रहे हैं। इनके द्वारा किराए के मकान में मदरसा का संचालन होता है, किराया अधिक होने पर जगह छोड़ देते हैं। गैर मान्यता प्राप्त मदरसा के संचालक नाम बदलकर नए स्थान पर मदरसा का संचालन शुरू हो जाता है। ये मदरसा कभी दारुल हुदा अल्बनत, जामिया दारुल हुदा, अल्बानिन बलबनात आदि नामों से संचालित हो रहे हैं। इन पर सरकार के द्वारा लगाम लगाए जाने की आवयश्कता है। जिससे गैर मान्यता प्राप्त मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों को मूलभूत सुविधा उपलब्ध हो सके। इन गैर मान्यता प्राप्त मदरसों में होने वाले फंडिंग पर भी नजर रखे जाने की आव्यशकता है, जिससे बच्चों के लिए आए पैसों की हकमारी नहीं हो सके।

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